
आस्था में प्रदुषण
हमारे आधुनिक होने के कारण हम अपनी आस्था में इतने अंधे हो गए है की अपनी आस्था के आगे अपने को और अपने देश फ़िर इस संसार को देख नही प् रहे है इसलिए तो हम आस्था के चलते हुम्बग्वान को मानाने के लिए धूपवती जैसी समर्ग्री को प्रयोग कर रहे है और हम सब ये सही तरीके से जानते है ही धूपवती से कितना प्रदुसान होता है जहा हम एक और कोपन हेगैन जैसी बैठक में हम धरती को विनाशन होने की बात करते है
अरे माना की ईशवर को मानना भी जरुरी होता है पर गीता जैसी महानग्रन्थ में तो ये ही लिखा है न की अगर
ईसीसी तरह से आदमी अपनी मर्जी चलता है तो एक दिन उसका अंत बहुत बुरी तरह से होता है
हम अगर इसी तरह से आपनी आस्था में अंधे होकर उन बाजारी लालाओकी बात को मानते हुए आपनी आस्था में अंधे होकर प्रदुसन करते रहे तो एक समय से पहेले धरती को विनाश सम्भव है